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RPSC वरिष्ठ अध्यापक (संस्कृत शिक्षा, Non-TSP) पेपर II हिंदी 2018

150 सवाल · पेज 1/8

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Q.1

किस शब्द में ‘वि’ उपसर्ग नहीं है ?

Q.2

किस शब्द में कोई उपसर्ग नहीं है ?

Q.3

किस विकल्प में ‘गार’ प्रत्यय युक्त शब्द नहीं है ?

Q.4

किस विकल्प में ‘कृदन्त’ (कृत् प्रत्यय युक्त) शब्द है ?

Q.5

इनमें से किस विकल्प के सभी शब्द ‘कृत प्रत्यय’ से बने हैं ?

Q.6

निम्नलिखित में से किस विकल्प में परस्पर विलोम शब्द नहीं है ?

Q.7

किस विकल्प के सभी शब्द परस्पर पर्यायवाची हैं ?

Q.8

किस शब्द में करण तत्पुरुष समास है ?

Q.9

किस शब्द-युग्म का अर्थ-भेद सुमेलित नहीं है ?

Q.10

‘ऐसा रोग जो छूने मात्र से फैलता हो’ - के लिए सार्थक शब्द होगा :

Q.11

किस विकल्प के सभी शब्द वर्तनी की दृष्टि से शुद्ध हैं ?

Q.12

व्याकरण की दृष्टि से कौन सा वाक्य अशुद्ध है ?

Q.13

इनमें से किस मुहावरे का भावार्थ सही नहीं है ?

Q.14

‘बहती गंगा में हाथ धोना’ का भावार्थ है

Q.15

अनेकार्थक शब्द ‘द्विज’ का कौन सा अर्थ असंगत है ?

Q.16

‘भारतीय संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी होगी’ - इस आशय का उल्लेख भारतीय संविधान की किस धारा में किया गया है ?

Q.17

खड़ीबोली हिन्दी का विकास किस अपभ्रंश से माना जाता है ?

Q.18

इनमें से कौन सी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित नहीं है ?

Q.19

टिप्पणी : निम्नलिखित गद्य-अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़कर प्रश्न का उत्तर दीजिए :

गद्य-अवतरण
भारतीय ऋषियों ने मानव जीवन को चार पुरुषार्थों में विभक्त किया है - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । ये चारों ही हमारी संस्कृति के अन्तर्गत आते हैं । अन्य शब्दों में - ‘पुरुषार्थ’ और संस्कृति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । उक्त चारों पुरुषार्थों में मोक्ष का धर्म के साथ सीधा संबंध माना गया है, लेकिन अर्थ और काम के लिए भी धर्म की मर्यादा को आवश्यक माना गया है । भारतीय संस्कृति का सदा से ही यह स्वर रहा है कि जो व्यक्ति या समाज धर्म को छोड़ देता है, उसके अर्थ और काम भी नष्ट हो जाते हैं । वस्तुतः, भारतीय संस्कृति अर्थ और काम को हेय नहीं मानती, बस उन पर धर्म का नियंत्रण आवश्यक मानती है । इस प्रकार भारतीय संस्कृति का मूल स्रोत धर्म ही है ।

किस व्यक्ति का अर्थ नष्ट हो जाता है ?

Q.20

टिप्पणी : निम्नलिखित गद्य-अवतरण को ध्यानपूर्वक पढ़कर प्रश्न का उत्तर दीजिए :

गद्य-अवतरण
भारतीय ऋषियों ने मानव जीवन को चार पुरुषार्थों में विभक्त किया है - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । ये चारों ही हमारी संस्कृति के अन्तर्गत आते हैं । अन्य शब्दों में - ‘पुरुषार्थ’ और संस्कृति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । उक्त चारों पुरुषार्थों में मोक्ष का धर्म के साथ सीधा संबंध माना गया है, लेकिन अर्थ और काम के लिए भी धर्म की मर्यादा को आवश्यक माना गया है । भारतीय संस्कृति का सदा से ही यह स्वर रहा है कि जो व्यक्ति या समाज धर्म को छोड़ देता है, उसके अर्थ और काम भी नष्ट हो जाते हैं । वस्तुतः, भारतीय संस्कृति अर्थ और काम को हेय नहीं मानती, बस उन पर धर्म का नियंत्रण आवश्यक मानती है । इस प्रकार भारतीय संस्कृति का मूल स्रोत धर्म ही है ।

उपर्युक्त अवतरण में भारतीय संस्कृति का मूल स्रोत किसे माना है ?

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