Q.41
‘प्रज्ञा प्रवाह’ में संकलित रचना ‘धरती धोरां री’ में रचनाकार ने राजस्थान की धरती की तुलना किससे की है ?
- (A)
सागर से
- (B)
स्वर्ग से
- (C)
दिव्यलोक से
- (D)
आकाश से
150 सवाल · पेज 3/8
इस पेपर का Syllabus:Syllabus (हिंदी)
Q.41
‘प्रज्ञा प्रवाह’ में संकलित रचना ‘धरती धोरां री’ में रचनाकार ने राजस्थान की धरती की तुलना किससे की है ?
सागर से
स्वर्ग से
दिव्यलोक से
आकाश से
Q.42
‘आलोक’ में संकलित ‘रानी लक्ष्मीबाई’ रचना के अनुसार रानी के दत्तक पुत्र का नाम क्या था ?
हरिहर
दामोदर
माधवन
मनोहर
Q.43
‘पुर तें निकसी रघुवीर वधू, धरि धीर दिये मग में डग द्वे ।’ ………… फिर बूझति है, ‘चलनो अब केतिक, पर्णकुटी करिहौं कित हवे ?’
वे सीता को ढाढ़स बँधाते हैं ।
वन की रमणीयता का उल्लेख कर सीता का ध्यान बटाते हैं ।
थोड़ी दूर और चलकर विश्राम करने की बात करते हैं ।
उनकी आँखों में आँसू भर आते हैं ।
Q.44
‘प्रज्ञा प्रवाह’ में संकलित ‘हार की जीत’ कहानी के लेखक हैं
सुदर्शन
प्रेमचंद
जैनेन्द्र
विश्वंभरनाथ कौशिक
Q.45
‘अपरा’ में संकलित ‘यात्रा का रोमांस’ पाठ के आधार पर बताइये कि निम्नलिखित में से कौन सा कथन गलत है ?
यायावर का रास्ता कभी समाप्त नहीं होता ।
यायावर की मंजिल पहले से तय होती है ।
यात्रा यायावर को तटस्थ दृष्टि देती है ।
यायावर जहाँ से गुजर जाए, वही उसका रास्ता है ।
Q.46
‘जिसके चरणों में पड़ा ताल, दर्पण-सा फैला है विशाल ।’ - ‘प्रज्ञा प्रवाह’ में संकलित रचना ‘पर्वत प्रदेश में पावस’ के अनुसार किसके चरणों में ‘विशाल ताल’ फैला हुआ है ?
पहाड़ी गाँव के
ऊँचे-ऊँचे वृक्षों के
पर्वत के
पहाड़ी पगडंडी के
Q.47
‘अपरा’ में संकलित ‘धरा और पर्यावरण’ रचना के अनुसार राष्ट्र के संतुलित विकास के लिए कितने प्रतिशत भूभाग पर जंगल होने आवश्यक हैं ?
33
30
25
35
Q.48
‘अपरा’ में संकलित रचना ‘गद्य साहित्य का आविर्भाव’ के अनुसार ‘प्रजाहितैषी’ पत्र के सम्पादक कौन थे ?
राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द
राजा लक्ष्मणसिंह
प्रतापनारायण मिश्र
भारतेन्दु हरिश्चंद्र
Q.49
‘अपरा’ में संकलित रचना ‘भारतीय जीवन-दर्शन एवं संस्कृति’ के अनुसार ‘सेवा’ का प्रकट रूप किसे माना है ?
त्याग
समर्पण
पूजा
विनम्रता
Q.50
‘अपरा’ में संकलित सूरदास के विनय संबंधी पदों में कवि ने किन लोगों का साथ छोड़ने के लिए कहा है ?
निन्दक
पाखंडी
लोक विमुख
हरि विमुख
Q.51
‘प्रज्ञा प्रवाह’ में संकलित रचना ‘उधार माँगना भी एक कला है’ के अनुसार बिना पूँजी के व्यापार प्रारंभ करने के लिए क्या करना चाहिए ?
मित्रों से सहयोग लेना चाहिए
रिश्तेदारों से सहायता लेनी चाहिए
उधार माँगने की कला का अभ्यास करना चाहिए
सहकारी बैंक से ऋण लेना चाहिए
Q.52
‘सृजन’ में संकलित रचना ‘मैं और मैं’ के अनुसार सबसे पहले किसके बारे में सोचना जरूरी है ?
अपने बारे में
परिवार के बारे में
देश के बारे में
मानव मात्र के बारे में
Q.53
‘इस माता और इस बहन की सिली हुई कमीज मेरे लिए मेरे शरीर का नहीं-मेरी आत्मा का वस्त्र है। इसका पहनना मेरी तीर्थयात्रा है।’
— उपर्युक्त उद्धरण ‘सृजन’ में संकलित किस रचना से लिया गया है ?
बाजार दर्शन
ठेले पर हिमालय
तौलिये
मजदूरी और प्रेम
Q.54
‘सृजन’ में संकलित आचार्य शुक्ल के निबंध ‘भय’ के आधार पर बताइए कि इनमें से कौन सा कथन असत्य है ?
भय जब स्वभावगत हो जाता है तब कायरता या भीरुता कहलाता है।
अशिक्षित होने के कारण अधिकांश भारतवासी भी भय के उपासक हो गए हैं।
अतिभय और भयकारक का सम्मान सभ्यता के लक्षण हैं।
भय का विषय दो रूपों में सामने आता है - असाध्य रूप में और साध्य रूप में।
Q.55
‘अपरा’ में संकलित बिहारी के दोहों में कवि ने ‘मुँहजोर तुरंग ज्यों’ किसे कहा है ?
नयनों को
मन को
दुष्ट नायक को
परकीया नायिका को
Q.56
‘सृजन’ में संकलित रहीम के ‘नीति के दोहे’ के अनुसार विपत्तिकाल में धन किस तरह विलीन हो जाता है ?
प्रातःकालीन ओस की तरह
प्रातःकालीन तारों की तरह
अमावस के चाँद की तरह
स्वार्थी मित्र की तरह
Q.57
‘आखिरकार वही हुआ, जिसका मुझे डर था
जोर-जबरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी ।’
‘सृजन’ में संकलित उपर्युक्त अवतरण के रचनाकार कौन हैं ?
कुँवर नारायण
शमशेर बहादुर सिंह
नरेश मेहता
अज्ञेय
Q.58
‘सरयू’ में संकलित कवि घनानंद के ‘प्रेम-पीर-वर्णन’ के अनुसार ‘प्रेममार्ग’ किनके लिए कठिन है ?
सीधे-सरल लोगों के लिए
ज्ञानमार्गियों के लिए
गृहस्थों के लिए
कपटी व्यक्तियों के लिए
Q.59
‘आराधन का दृढ़, आराधन से दो उत्तर,
तुम वरो विजय, संयत प्राणों से प्राणों पर ।
रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त,
तो निश्चय तुम हो सिद्ध, करोगे उसे ध्वस्त ।’
विभीषण का
लक्ष्मण का
जाम्बवान का
हनुमान का
Q.60
“संगत कीजै साधु की, कभी न निष्फल होय ।
लोहा पारस परस ते, सो भी कंचन होय ।”
उपर्युक्त पंक्तियाँ ‘सृजन’ में संकलित इनमें से किस कवि की हैं ?
तुलसीदास
बिहारी
रहीम
कबीर