Q.41
चित्रात्मकता, नाद तथा भाव का आनन्द किसके रूप हैं ?
- (A)
गद्य शिक्षण
- (B)
पद्य शिक्षण
- (C)
रचना शिक्षण
- (D)
व्याकरण शिक्षण
150 सवाल · पेज 3/8
इस पेपर का Syllabus:Syllabus (हिंदी)
Q.41
चित्रात्मकता, नाद तथा भाव का आनन्द किसके रूप हैं ?
गद्य शिक्षण
पद्य शिक्षण
रचना शिक्षण
व्याकरण शिक्षण
Q.42
‘एक धावा हो जाए तो गर्मी आ जाए’, ‘उसने कहा था’ कहानी में यह कथन किसका है ?
वजीरासिंह
लहनासिंह
कीरतसिंह
बोधासिंह
Q.43
निम्नलिखित में से कौन सा हिन्दी शिक्षण में चित्रों का उपयोग नहीं है ?
नवीन पाठ की प्रस्तावना निकालने हेतु
पाठ को विकसित करने हेतु
मुख्य बिंदुओं को स्पष्ट करने हेतु
योजना की रूपरेखा लिखने हेतु
Q.44
य् वर्ण के सम्बन्ध में असंगत है
तालव्य
अघोष
अल्पप्राण
अन्तस्थ
Q.45
निम्न में से शुद्ध शब्द है :
सौंदर्यता
आधीन
लब्धप्रतिष्ठ
अक्षोहिणी
Q.46
किस वाक्य में विराम चिह्नों का सही प्रयोग हुआ है ?
आपने बताया नहीं, कि आप कहाँ रहते हैं ?
आपने, बताया नहीं कि आप, कहाँ रहते हैं ।
आपने बताया नहीं कि आप, कहाँ रहते हैं ?
आपने बताया नहीं कि आप कहाँ रहते हैं ।
Q.47
निम्नलिखित अनुच्छेद के आधार पर उत्तर दीजिए :
जिन कर्मों में किसी प्रकार का कष्ट या हानि सहने का साहस अपेक्षित होता है उन सब के प्रति उत्कण्ठापूर्ण आनन्द उत्साह के अन्तर्गत लिया जाता है । कष्ट या हानि के भेद के अनुसार उत्साह के भी भेद हो जाते हैं । साहित्य-मीमांसकों ने इसी दृष्टि से युद्ध-वीर, दान-वीर, दया-वीर इत्यादि भेद किये हैं । इनमें सबसे प्राचीन और प्रधान युद्ध वीरता है, जिसमें आघात, पीड़ा क्या मृत्यु तक की परवा नहीं रहती । इस प्रकार की वीरता का प्रयोजन अत्यन्त प्राचीन काल से पड़ता चला आ रहा है, जिसमें साहस और प्रयत्न दोनों चरम उत्कर्ष पर पहुँचते हैं । पर केवल कष्ट या पीड़ा सहन करने के साहस में ही उत्साह का स्वरूप स्फुरित नहीं होता । उसके साथ आनन्द-पूर्ण प्रयत्न या उसकी उत्कण्ठा का योग चाहिए । बिना बेहोश हुए भारी फोड़ा चिराने को तैयार होना साहस कहा जायेगा, पर उत्साह नहीं । इसी प्रकार चुपचाप, बिना हाथ-पैर हिलाये, घोर प्रहार सहने के लिए तैयार रहना साहस और कठिन-से-कठिन प्रहार सहकर भी जगह से न हटना धीरता कही जायेगी । ऐसे साहस और धीरता को उत्साह के अन्तर्गत तभी ले सकते हैं जबकि साहसी या धीर उस काम को आनन्द के साथ करता चला जायेगा जिसके कारण उसे इतने प्रहार सहने पड़ते हैं । सारांश यह कि आनन्दपूर्ण प्रयत्न या उसकी उत्कण्ठा में ही उत्साह का दर्शन होता है, केवल कष्ट सहने के निश्चेष्ट साहस में नहीं । धृति और साहस दोनों का उत्साह के बीच संचरण होता है ।
उत्साह का स्वरूप स्फुरित होता है
पीड़ा सहन करने के साहस में ।
घोर प्रहार सहन करने के साहस में ।
कष्ट सहने के निश्चेष्ट साहस में ।
आनन्दपूर्ण प्रयत्न या उसकी उत्कण्ठा में ।
Q.48
शब्द-शक्तियों के संबंध में कौन सा कथन सुमेलित नहीं है ?
शब्द की शक्ति उसके अंतर्निहित अर्थ को व्यक्त करने वाला व्यापार है ।
शब्द का लोक प्रचलित, नामवाची अर्थ-बोध कराने वाली शक्ति अभिधा है ।
शब्द का साक्षात् संकेतित अर्थ-बोध कराने वाले व्यापार को व्यंजना शक्ति कहते हैं ।
मुख्यार्थ बाधित होने पर रूढ़ि या प्रयोजन से अन्य अर्थ-बोध लक्षणा शक्ति से होता है ।
Q.49
“साहित्यिक प्रवृत्तियों और रीति-आदर्शों का साम्य-वैषम्य ही साहित्य के इतिहास के काल-विभाजन का आधार हो सकता है ।” काल-विभाजन के संबंध में यह कथन किसका है ?
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
डॉ. नगेन्द्र
नंददुलारे वाजपेयी
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
Q.50
दोहा-चौपाई में निबद्ध मसनवी शैली में लिखी गई भक्तिकाल की प्रमुख रचना है -
रामचरितमानस
सूर सारावली
पद्मावत
दोहावली
Q.51
“इस द्वितीय उत्थान के आरंभकाल में हम पं. महावीर प्रसाद जी द्विवेदी को पद्यरचना की एक प्रणाली के प्रवर्तक के रूप में पाते हैं।” उक्त कथन है
डॉ. रामविलास शर्मा
श्रीधर पाठक
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
Q.52
‘जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना।।’ बालकाण्ड की इस चौपाई में प्रयुक्त ‘जहाना’ शब्द का अर्थ है
जानना
मनुष्य
जगत्
ईश्वर
Q.53
हिन्दी भाषा के उद्भव से असंबद्ध अपभ्रंश किस विकल्प में है ?
शौरसेनी
महाराष्ट्री
अर्द्धमागधी
मागधी
Q.54
निम्नलिखित में से द्विगु समास का उदाहरण नहीं है :
सतसई
इकतीस
पंसेरी
अष्टाध्यायी
Q.55
संज्ञा शब्दों के संबंध में असंगत कथन है
व्यक्तिवाचक संज्ञा अनेक बार जातिवाचक संज्ञा के रूप में परिवर्तित होती है ।
कई बार जातिवाचक संज्ञा का प्रयोग व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में होता है ।
संज्ञा शब्दों में केवल दो ही कारणों - लिंग और वचन - से विकार होता है, अन्य किसी कारण से नहीं होता ।
भाववाचक संज्ञाएँ क्रिया, विशेषण आदि शब्दों से बनाई जाती हैं ।
Q.56
निम्नलिखित में से किस विकल्प में समश्रुत भिन्नार्थक शब्दों का अर्थ संगत नहीं है ?
अनुदित - अनूदित = भाषांतरित - अकथनीय
पृष्ट - पृष्ठ = पूछा हुआ - पीठ
निहत - निहित = नष्ट - छिपा हुआ
उत्पल - उपल = कमल - रत्न
Q.57
निम्नलिखित में से छंद विषयक असंगत कथन है :
हरिगीतिका छंद के प्रत्येक चरण में 26 मात्राएँ होती हैं।
सोरठा छंद के विषम चरणों में 11 मात्राएँ होती हैं।
दोहा छंद के सम चरणों के अंत में गुरु - लघु होता है।
चौपाई मात्रिक सम छंद है।
Q.58
‘लोग हैं लागि कवित्त बनावत मोहिं तौ मेरे कबित्त बनावत ।’
उपर्युक्त पंक्ति किस कवि की है ?
बिहारी
देव
घनानन्द
सेनापति
Q.59
‘हाथी हाथळ आहणै,
नाहर जिण-रो नाम ।’
उपर्युक्त पंक्ति में रचनाकार ने किसे सिंह कहा है ?
जो हाथी की सवारी करे।
जो अपने हाथों से हाथी को लाए।
जिसके हाथ हाथी जैसे हो।
जो हाथी को हथेली की थाप से ही मार डाले।
Q.60
शुक्ल जी के ‘उत्साह’ निबन्ध के अनुसार ‘उत्साह’ में किन दो भावों का योग होता है ?
साहस और आनन्द
कर्म और फल
व्यक्ति और वस्तु
तत्परता और प्रसन्नता